अधिकांशतः किसी भी राजनीतिक या सरकारी नीतियों और कानूनों पर मैं कोई टीका-टिपण्णी नहीं करता, कोई आर्टिकल नहीं लिखता | लेकिन 2020 के कृषि से सम्बंधित तीन कानूनों के सन्दर्भ में ये एक अपवाद है |

कृषि सुधार के तीन मुख्य बिंदु
1. – एपीएमसी की व्यवस्था और हमारे परिवार का बजट – खरीदी
2. आमंदनी का पहले से ही अनुमान लगाना अब कैसे किसान के नित्यंतरण में आ गया है – कीमत
3. भंडारण की पुरानी व्यवस्था और इसके कारण कैसे नुक्सान होता था – भंडारण

मैं एक किसान रह चुका हूँ | खेतों में काम किया है, सब्जियां और दालें उगाई है, मंडियों में जा-जाकर बेचा है | 2020 कृषि-सुधार को समझने के लिए – (1) सबसे पहले एपीएमसी की व्यवस्था को समझना होगा, बिचौलिओं की व्यवस्था को समझना होगा; (2) कीमत निर्धारण की व्यवस्था को समझना होगा और (3) आवश्यक वस्तुओं के भण्डारण से सम्बंधित के  पुराने नियमों को समझना होगा | मैं पूरी बात एक किसान के दृष्टिकोण से; एक गृहणी और एक विद्यार्थी के दृष्टिकोण से सरल भाषा में रख रहा हूं | [1]

खेती एक ऐसा क्षेत्र है जिसपर ना ही केवल हम सबके परिवार का भोजन, हमारा स्वास्थ्य, हमारा बजट आश्रित है, लेकिन सच तो यह है कि अनेक तथाकथित कॉर्पोरेट क्षेत्र भी कृषि पर आधारित हैं; कृषि पर आश्रित हैं – आप स्वयं ही सोचिए – सॉस, आटा, नूडल्स, फ़ूड-ऑर्डरिंग एप्प्स, हेल्थड्रींक्स, होटल इंडस्ट्री… लिस्ट बहुत बड़ी है |

पिछले कुछ वर्षों में ” टेक्नॉलोजी ” का उपयोग करके और “फ़ार्म टू-फोर्क” जैसे स्लोगनों के साथ कृषि क्षेत्र में आंदोलन लाने के प्रयास हुए, लेकिन अंततः ये सभी कॉर्पोरेट क्षेत्र के खरीदी के औजार बन के रह गए |

सांख्यिकी statistics के अनुसार कृषि क्षेत्र “जीडीपी का 16 %” हो सकता है, लेकिन एक किसान के लिए (?)उसकी जीडीपी का यह 100% होता है | यह बात महत्वपूर्ण है – आइए, इसे दोहराते हैं – सांख्यिकी के अनुसार कृषि क्षेत्र “जीडीपी का 16%” हो सकता है लेकिन एक किसान के लिए यह उसकी अपनी जीडीपी का 100% होता है |

अब आगे की बात समझना आसान होगा |

1 – एपीएमसी की व्यवस्था – खरीदी

एपीएमसी जैसी व्यवस्थाएँ असंगठित किसानों से खरीदी करने के लिए संगठित बिचौलियों की व्यवस्था है | 2020 के कृषि सुधार से पहले किसान अपनी उपज केवल एपीएमसी को ही बेचने के लिए बाध्य थे | Farmers were restricted to sell their products anywhere other than APMC . संगठित बिचौलिए आपस में ही इशारों-इशारों में “आज का खरीदी मूल्य” तय कर लेते थे | यह मूल्य  बाजार भाव का 5 से 10 प्रतिशत तक होती हैं – यानि जो भाजी हम बीस रूपए / किलो खरीदते हैं, शायद उसके लिए किसान को मात्र एक या दो रूपए मिलते होंगे – बस ! मैंने ऐसी स्थिति 20-25 साल पहले देखा था – और आज भी स्थिति बदली नहीं है | आइए देखें बेंगलोर से एक सीन [2]

किरण कुमार जी – मैं अभी एक बुफे लंच लेकर आया जहां (सलाद में) टमाटर भी थे | मेरी बातचीत श्री नागराज के साथ | बेंगलोर के माराथल्ली एरिया में टमाटर पंद्रह-बीस रूपए किलो मिलता है | मैंने नागराज जी से पूछा कि उनके अनुसार किसान को (इसमें से) कितना मिलता होगा ? आप बताइये नागराज जी…

नागराज जी एक कृषक हैं – उन्होंने बताया – “कल हमने यशवंतपुर एपीएमसी में पचास पैसे प्रतिकिलो के भाव से टमाटर बेचे – forced to sell – फोर्स्ड-टू-सेल – दबाव में आकर (हमारे पास कोई और विकल्प ही नहीं है )

किरण कुमार जी – क्या आप श्योर हैं – एक रूपए में दो किलो ???

किरण कुमार जी ने बताया कि यह सीन 2018 का है |

ये तो हुई केवल ताजे उत्पाद के खरीदी बिक्री की कहानी – भण्डारण और कोडस्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, और फ़ूड-प्रोसेसिंग करके बनाए जाने वाले मुनाफेदार ब्रांडेड प्रोडक्ट के रेंज – इन सबकी तो बात अभी हमने छेड़ी भी नहीं है; इकॉनॉमिक्स के डेटा को तो हमने हाथ भी नहीं लगाया कि कृषिक्षेत्र कितने लाखों करोड़ों लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जीवनयापन के लिए सहारा देता है; माध्यम देता है | फिर भी आइए – एपीएमसी के बारे में चर्चा आगे बढ़ाते हैं |

क्या एपीएमसी जैसी व्यवस्थाएँ एकदम साफसुथरी हैं ? सपाट शब्दों में कहा जाए तो – नहीं | प्रत्येक ऐसी संभावना और अवसर जहाँ बहुत बड़ी मात्रा में पैसे का लेनदेन हो सकता है, उदाहरण के लिए शिक्षा, या जनसाधारण के लिए भोजन और स्वास्थ्य – परदे के पीछे से एक शक्तिशाली गुट या कार्टेल ही नियंत्रित करते हैं | सम्भवतः एपीएमसी के साथ भी ऐसा हो रहा है या कम-से-कम अभीतक होता रहा था | ये एक सामान्यीकरण generalization नहीं है | अन्यथा आप ही सोचिए, क्यों कुछ गिनेचुने लोग, लगभग बिना कोई मेहनत किए करोडो-अरबों की संपत्ति बना लेते हैं, जबकि सच तो यह है कि ईमानदारी और मेहनत के साथ महीने में एक लाख रूपए कमाने में भी शायद आज भारत के 2-3% लोग ही सक्षम होंगे | लगभग बिना कोई मेहनत किए हुए करोड़ों कमाने वाले बिचौलिओं के उदाहरण आप ही स्वयं अपने मन में सोचिए – मैं यहाँ पर किसी का नाम देना अवॉयड कर रहा हूँ | लेकिन हम सब ऐसे नेताओं को अवश्य जानते हैं जिनका अपना कोई उद्योग-धंधा नहीं है लेकिन फिर भी करोड़ों-खरबों की संपत्ति के मालिक हैं |

नॅशनल कमीशन फॉर फार्मर्स 2006  ने अनुशंसा की थी कि एपीएमसी अस्सी किलोमीटर के दायरे में अपनी सेवाएं दें | लेकिन यथास्थिति ऐसी है कि औसतन 490 किलोमीटर के दायरे में ऐसी एक मंडी होती है | अतः किसान के लिए ना तो धुलाई का खर्चा कम हुआ और ना ही किसान को उचित कीमत, न्यूनतम कीमत मिली क्योंकि ऐसी मंडियों में कीमत निर्धारित करते हैं संगठित बिचौलिए खरीददार जिनका लगभग एकक्षत्र साम्राज्य होता है ! आखिर वे किसान ऋण वापस करें भी तो कैसे ? और फिर, किसानों की ऋण माफ़ी के नाम पर राजनीती का अलग ही मायाजाल…

और क्या हमें मालूम है कि एपीएमसी में खरीदी कर सकने के लिए लाइसेंस चाहिए – हमने तो सुना था कि “लाइसेंस राज ख़तम हो चूका है ” (!) शायद इसीलिए खाद्यवितरण के लिए कोई इनोवेशन नहीं हो रहा है अन्यथा क्या यहाँ कोई रॉकेट साइंस है ?

2020 में लागू नए कानून के साथ किसान अब अपने उत्पाद कहीं भी बेच सकते हैं – चाहें तो एपीएमसी के अंदर भी; या एपीएमसी के ठीक बाहर, या खुले बाजार में, या फ़ूड प्रोसेसिंग करने वाली फैक्ट्रियों को; या कोल्ड-स्टोरेज को; या सीधे ही सामाजिक संगठनों को, स्वयं सहायता ग्रुप्स SHGs को यदि उनके पास पैन कार्ड है, और इससे एक कदम आगे – डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी !

अर्थात एपीएमसी का एकक्षत्र साम्राज्य समाप्त |

2 – आमदनी का अनुमान – कीमत

कृषिक्षेत्र में एक और विसंगति थी – फसल के लिए खेत तैयार करने से फसल काटने तक किसान ये अंदाजा नहीं लगा सकते थे कि आखिर उन्हें अपनी मेहनत से आमदनी कितनी हो सकती है; There was no mechanism by which a farmer could estimate his return on investments and efforts. MSP अर्थात मिनिमम सपोर्ट प्राइस –  न्यूनतम सपोर्ट कीमत – उत्पाद के बाजार में आने के आसपास निर्धारित की जाती थी | इसका अर्थ यह कि किसान अपनी मेहनत से मिलने वाले फायदे का अनुमान भी नहीं लगा सकते थे…! और उसपर मौसम के उतार-चढ़ाव का दबाव |

नए कानून में यह प्रावधान है कि एक तरफ किसान और दूसरी तरफ खरीददार पहले से ही खरीदी की एक कीमत निर्धारित fix करके कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में जुट सकें | किसी भी अच्छे उद्यम की तरह, कृषि में भी योजनाबद्ध तरीके से काम करने के लिए थोड़ी तो स्पष्टता होनी चाहिए | एक उद्यमी और एक किसान के काम और काम करने के तरीके में काफी पहलू एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं | आप मेरी पुस्तक – व्यवसाय उपनिषद् एक बार अवश्य देखना चाहेंगे | लिंक मैं  नीचे दे रहा हूँ [3]

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3 – भण्डारण की विसंगतियाँ – भंडारण

कृषिक्षेत्र की तीसरी विसंगति थी कि ट्रेडर्स एक सीमित मात्रा में ही खरीदी कर सकते थे | 1955 का एसेंशियल कमोडिटीज़ एक्ट एक सीमा से अधिक मात्रा में खरीदी करने पर पाबंदी लगाता था | There was cap on how much quantity could a trader buy from the farmers.

कृषिसुधार से सम्बंधित 2020 के कानूनों का तीसरा हिस्सा है – एसेंशियल कमोडिटीज़ एमेंडमेंट ऑर्डिनेंस – जो किसानों से ट्रेडर्स कितनी मात्रा में उत्पाद खरीद सकते हैं – इस की सीमा से नियंत्रण को समाप्त करता है | इस सीमा के कारण होता यह था कि उत्पाद हाथ में होते हुए भी किसान ट्रेडर्स और वेयरहाउसेज को बेच नहीं पाता  था – किसान-व्यापारी दोनों के हाथ बंधे हुए थे, और माल खराब हो जाता था |

सारांश में

कृषिसुधार 2020 के दूरगामी फायदे अनेक –

  • अब कृषि बनेगा एक पसंदीदा कॅरियर,
  • क्षेत्रीय अवसर होने के कारण मेट्रो सिटीज की ओर पलायन की ट्रेंड पड़ेगी कमजोर
  • कृषि क्षेत्र नए रोजगार उत्पन्न करेगा – जी हाँ “गरीब किसान” अब रोजगार उत्पन्न करेगा और अर्थव्यवस्था को मजबूती से बड़े योगदान देगा,
  • निर्यात के अवसर, विदेशी मुद्रा बचाने और कमाने के अवसर –
  • आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ी छलांग

कृषक अब होंगे और स्वतन्त्र और समृद्ध – पीरियड.


नोट्स

[1] विचारों और जानकारी को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने में अनेक श्रोत से सहायक जानकारी मिली, विशेष उल्लेख – यह आलेख –https://www.prsindia.org/billtrack/farmers-produce-trade-and-commerce-promotion-and-facilitation-bill-2020

[2] बेंगलोर के एपीएमसी का वृत्तांत – श्री किरण कुमार जी के ट्वीट के माध्यम से – https://twitter.com/KiranKS/status/980456296221732864

[3] व्यवसाय उपनिषद् पुस्तक खरीदने के लिए लिंक – https://addwit.org/shop/vyavsaay-upanishad/

[4] इस आलेख के ऑडियो प्रतिरूप में जोशीले बैकग्राउंड म्युज़िक के लिए आभार – श्री बलजिंदर सिंह जी के यूट्यूब चैनल से उनके द्वारा बजाया गया बांसुरी का सुरीला धुन – https://youtu.be/G9S_y1-HDjc

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